खो जाना चाहता हूं
वसंत पवन में
धूप में
ज्योत्स्ना में
पंछियों के मधुर सूर में .........
लौटा पाओगे मुझे
पृथ्वी का खोया हुआ यौवन ?
की-बोर्ड पर चलती उंगलियाँ लगातर तोड़ रही हैं कमरे की नीरवता कुछ देर पहले तक बालकनी पर बिखरी पड़ी थी चांदनी अब अँधेरा है कुछ ही पल में दरवाजे...
आज की इस स्वार्थ भरी दुनिया में भाई-भाई का नहीं होता, लोग माँ-बाप के नहीं होते। उनसे क्या उम्मीदें की जाएँ जो अपनी माँ के नहीं हुए, वे धरती माँ के क्या होंगे!
ReplyDelete