मैंने पढ़ी थी
सिर्फ एक कविता 'विद्रोही ' कवि की
'बलो वीर '
उन्होंने कहा -
देशद्रोही मुझे
मुझे आई हंसी
और उन्हें क्रोध ....
सिर्फ एक कविता 'विद्रोही ' कवि की
'बलो वीर '
उन्होंने कहा -
देशद्रोही मुझे
मुझे आई हंसी
और उन्हें क्रोध ....
की-बोर्ड पर चलती उंगलियाँ लगातर तोड़ रही हैं कमरे की नीरवता कुछ देर पहले तक बालकनी पर बिखरी पड़ी थी चांदनी अब अँधेरा है कुछ ही पल में दरवाजे...
gagar men sagar.
ReplyDeleteये तो होना ही था ...
ReplyDeleteशुक्रिया मृदुला जी , दिगम्बर जी
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