Thursday, July 16, 2020

नार्थ -ईस्ट

हम कितना जानते हैं
और कितने जुड़े हुए हैं
पूर्वोत्तर के लोगों से , उनके दर्द, तकलीफ़
जीवन-संघर्ष से
और कितना जानते हैं उनकी ज़रूरतों के बारे ?
यह सवाल आज अचानक नहीं उठा है मन में
जब कभी फोन से पूछता हूँ वहां किसी मित्र से हाल
और कहता हूँ
-आप लोगों की ख़बर नहीं मिलती
तब हमेशा सुनने को मिलता है एक ही बात -
यहां से भारत बहुत दूर है !
इरोम शर्मीला को भी हम अक्सर याद नहीं करते हैं
कुछ ज़रूरत भर अपने लेखन और भाषण में
करते हैं उनका जिक्र
ब्रह्मपुत्र जब बेकाबू होकर डूबो देता है वहां जीवन
बहा ले जाता है सब कुछ
हम कांजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में मरे हुए जानवरों की तस्वीरें साझा करते हैं
हमारी संवेदनाएं तैरने लगती है
सोशल मीडिया की पटल पर
सेवेन सिस्टर राज्यों के कितनी बहनों को
हमने दिल्ली में अपमानित होते देख अपनी आवाज़ उठाई है ?
जब कोई हमारी गली में उन्हें
चीनी, नेपाली, चिंकी, छिपकली
और अब कोरोना कह कर अपमानित करता है
हमने कब उसका प्रतिवाद किया है
कब हमने जुलूस निकाला है उनके अपमान के खिलाफ़
याद हो तो बता दीजिए
हमने नार्थ ईस्ट को सिर्फ सुंदर वादियों , घाटियों
और चेरापूंजी की वर्षा के लिए याद किया अक्सर
अरुणाचल के सूर्योदय के लिए याद किया
हमने कामाख्या मंदिर और ब्रह्मपुत्र के लिए अपनी स्मृति में सजा रखा है
पर हम उनकी तकलीफ़ों में शामिल होने से बचते रहे हैं हमेशा
सुरक्षा बलों के विशेषाधिकार तो याद है हमें
हमने वहां के लोगों की अधिकार की बात नहीं की है
राजनेताओं का चरित्र तो वहां भी दिल्ली जैसा ही है
और बाकी जो आवाज़ उठाता है अलग होकर
वह कैद कर लिया जाता है
भूपेन हज़ारिका के एक गीत के बोल याद आते हैं मुझे -
'दिल को बहला लिया , तूने आस -निराश का खेल किया'
समय अपनी रफ़्तार से चल रहा है
बाढ़ में फिर डूब गया है असम
मेरे दोस्त अब भी कहते हैं - यहां से बहुत दूर है भारत !
हमने कभी नहीं सोचा
वे ऐसा क्यों कहते हैं !!
हम अपने कमरों में बैठकर दार्जिलिंग चाय पी रहे हैं ......

Tuesday, July 14, 2020

उदासी में ही मैं लिख सकूंगा प्रेम की सबसे मुकम्मल कविता

याद है तुम्हें
मैंने कहा था तुमसे
अच्छा लगता है मुझे
मेरा उदास होना
दरअसल अपनी उदासी में ही मैं
खुद में होता हूँ पूरी तरह
जब भर आती हैं मेरी आँखें और धुंधली पड़ती हैं
वहमी रिश्ते -नातों की तस्वीरें
मैं केवल सोचता हूँ अपने बारे में
और कल रात जब मैं फोन पर झगड़ रहा था तुमसे
तुम्हारी ही किसी बात पर
क्योंकि मेरी ख़ामोशी पर तुम बार- बार पूछती
कि 'मैं क्यों हूँ उदास' ?
मैं परेशान होता हूँ तुम्हारे इस सवाल से
न पूछो कभी मुझसे मेरी उदासी का राज
बस जब मैं खामोश रहूँ लम्बे समय तक
तुम समझ लेना कि मैं खुद के साथ हूँ
मतलब मैं सोच रहा हूँ तुम्हें
दरअसल उस दौरान मैं विलीन होता हूँ प्रेम में
और सोचता हूँ एक प्रेम कविता पर
जिसे मैं लिख सकूं तुम्हारे लिए
और मुझे लगता है कि
अपनी उदासी में ही मैं लिख सकूंगा
प्रेम की सबसे मुकम्मल कविता
तुम्हारे लिए..!!
--------------------
रचनाकाल :  जुलाई 14 , 2015


Thursday, July 9, 2020

अंधकार का साम्राज्य विस्तार ले रहा है

रात की लम्बाई बढ़ गयी है
या सुबह देर से आने लगी है
इनदिनों
या अंधेरा और सन्नाटे ने
अड्डा जमा लिया है भीतर !
चारों ओर हाहाकार
चीत्कार
बदबूदार हवा
लावारिस शवों के बीच
चली रही है सांसे
देह के साथ
सोच भी संक्रमित हो रही है
भरोसा भी अब धोखा देने लगा है
रात की उम्र बढ़ गयी है
अंधकार का साम्राज्य विस्तार ले रहा है
भीतर ही भीतर !

Tuesday, July 7, 2020

हम लाशों की तसवीर उतारने लगे हैं

हमारी संवेदनाओं का आलम न पूछो
हत्यारे को रोक नहीं पाते हत्या करने से
इसलिए हत्या के बाद
हम लाशों की तसवीर उतारने लगे हैं
और हत्या का करते हैं लाइव !
हत्या के वक्त वह चीख़ता रहा
रोता रहा
गिड़गिड़ाते हुए मांगता रहा मदद उम्मीद की नज़रों से
हमारी सुनने की शक्ति ख़त्म हो चुकी है
हम मनोरंजन के आदी हैं
सदियों से हम हत्या का जश्न मनाते आ रहे हैं
हर हत्या के बाद बाढ़ आती है
बहने लगती हैं हमारी संवेदनाएं
कवि कविता लिखता है हत्या की निंदा में
एक्टिविस्ट कैंडिल मार्च का करते आयोजन
तभी पता चलता है
हत्यारे छूट गए हैं जमानत पर
और मंत्री महोदय माला पहनाकर उनका स्वागत करता है
अब सड़क पर उतरते हैं विपक्षी दल यह भूल कर
कि उनके शासन में जो हत्याएं हुई थी
उनका इंसाफ़ नहीं हुआ है अब तक
हत्या यूं ही नहीं होती
हत्या की जाती है
कभी जश्न के लिए
अक्सर राजनीति के लिए ।।।

Monday, July 6, 2020

हम भी शामिल रहें उनके तमाम अपराधों में

वे लोग चाँद पर
घर बनाने की बात कर रहे थे
सभ्यता का स्थानान्तरण करना चाहते थे
इसी लालच में ग्रह मंगल की खोज में लग गये
जबकि अब तक जिस पृथ्वी पर बसे हुए हैं
उसे बचाने के लिए कुछ नहीं किया
विकास के नाम पर विनाश के हथियार बनाए
हवा में ज़हर मिलाया
और पानी में इंसानी खून
आधुनिकता की चाह में उन्होंने सबसे पहले
संवेदनाओं का क़त्ल किया
उन्होंने धर्म का दुरुपोयोग किया
उन्होंने अपने ईश्वर तक को धोखा दिया
मंदिर-मस्ज़िद के बहाने लोगों को लड़वा दिया
भगवान के नाम पर उन्होंने बस्तियां जला दी
कई नगर उड़ा दिए
उन्होंने प्रेम के नाम पर छल किया
विश्वास के नाम पर धोखा दिया
जंगल काट दिए
पहाड़ तोड़ दिया
नदी सूखा दिए
उन्होंने करोड़ों लोगों को भूखा मार दिया
बच्चों की सांसे रोक दी
इस तरह हर हत्या को जायज़ बनाने के लिए
कोई न कोई बहाना खोज लिया
उन्होंने इंसानों को गुलाम बनाया
और उसे व्यापार कहा
हम भी शामिल रहें उनके तमाम अपराधों में
हम ख़ामोशी से देखते रहे
सहते रहे सब कुछ

Wednesday, June 24, 2020

चेहरों ने अभिव्यक्ति की भाषा खो दी है

उन लोगों का कहना है
सब ठीक होगा
उम्मीद की इस दवा की
वैधता कितनी बची है अब
आखिरी रात कब सोये गहरी नींद याद नहीं
सुबह का इंतज़ार रहता इनदिनों
सपनों ने आत्महत्या कर ली है
बारिश के बाद छाता भी तो बोझ लगता है
मेरी भाषा भी अब
संक्रमित हो चुकी है
सभ्यता की उम्मीद बेकार है
इस दौर में भी खुश हैं जो लोग
उन्हें देख कर हंस लेना भी अब छल लगता है
भोजन की खुशबू से पेट नहीं भरता
और मजदूर जीना चाहता है
इस चाहत पर भी दिक्कत है उनको
इस चाहत को भी तो लालच कहा है आपने
आपकी बातों से
उसकी भूख नहीं मिटती
संतुलन अब कहीं नहीं है
मौत भारी है जीवन पर
चेहरों ने अभिव्यक्ति की भाषा खो दी है
आँखों में झांक कर देखा है कभी आपने ?
आँखों की भाषा सबको नहीं आती है

Friday, June 12, 2020

चींटियाँ कतार बना कर चल रही हैं बिना किसी आपसी टकराव के

कितना असभ्य लगता है
कि भुखमरी, शोषण, हत्या आदि के खिलाफ
जिन्हें लड़ना था मिलकर
वे आपस में लड़ने लगे हैं
वैश्विक संक्रमण के इस दौर में
यह फासीवादी सत्ता की जीत है
जिस वक्त एक-दूसरे की ताकतों पर बात करनी थी
उस वक्त वे एक-दूसरे की कमियां गिना रहे हैं !
सोचकर देखिएगा-
कहीं हम फासीवाद के जाल में तो नहीं फंस गये हैं
बांटो और राज करो की नीति का शिकार तो नहीं बन गये हैं !
यह हमलों का दौर है
किंतु पहले दुश्मन की पहचान ज़रूरी है
विभाजनकारी ताकतों की शिनाख्त ज़रूरी है
मित्र बनकर भीतर बैठा शत्रु सबसे घातक होता है
एक भी गलत निशाना विनाश ला सकता है
पूरे शरीर को नीला पड़ने से पहले
इस ज़हर को फैलने से रोकना होगा
नफ़रत का संक्रमण सबसे पहले
इंसानियत को मार देता है
अब, जब उड़ चुकी है रातों की नींद हमारी
तो सपनों की बात फ़ुज़ूल है
कितना ज़हर भर चुका है हमारे भीतर
यह जांचने का वक्त है
हमने बिना सोचे ही गिद्धों को बदनाम किया है
और वे विलुप्त होते चले गये शर्म से
इस तरह हम बेशर्म हो गये
मेरे कमरे के बाहर चींटियाँ कतार बना कर चल रही हैं
बिना किसी आपसी टकराव के !!

युद्ध की पीड़ा उनसे पूछो ....

. 1.   मैं युद्ध का  समर्थक नहीं हूं  लेकिन युद्ध कहीं हो तो भुखमरी  और अन्याय के खिलाफ हो  युद्ध हो तो हथियारों का प्रयोग न हो  जनांदोलन से...