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डरा हुआ व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता
डरा हुआ व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता मैं बहुत डरपोक हो गया हूं तुमसे मिलने के बाद तुम्हे जान लेने के बाद ! जबकि जानता हूं मैं डरपोक नहीं हूं...
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यही तो विडंबना है मेरे भाई , अब कब जागोगे
ReplyDeleteहाँ,सुनील जी ने गागर में सागर भरने के वजन की टिप्पणी की है. जोड़ना केवल यह है कि प्रश्न'अब कब जागोगे'नही, 'हम-आप कब जागेंगे?' का बनता है.
ReplyDeleteसुनील जी, धन्यवाद . "मैं " पहचान नही पाए आप
ReplyDeleteजिंदगी को हम लोगो ने ऐसा बना लिया है की चलते हुए भी सोते रहते है...और फिर दूसरे से जागने की अपेक्षा करते है...जब सड़को पर चलते है तो देख कर आँख फिरा लेते है...अब मुझे लगता है की जागने के लिए कोई जागरण दिवस सरकार को घोषित करना पड़ेगा...लेकिन सरकार क्या करेगी ये सब जानते है...नित्यानंद जी आप की कविता हो सकता है कुछ लोगो को जागरण दिवस के पहले जगा दे और सरकार को जागरण दिवस घोषित ना करना पड़े...
ReplyDeletebilkul sach kaha.........badhia
ReplyDeleteshukriya ana jee, vivek jee.
ReplyDelete"मैं " नासमझ दर्शक की तरह
ReplyDeleteसब कुछ खामोश देख रहा हूं //
waqt aa gaya hai isi khamoshi ko todne ki..
Khaamoshee ko pakne do..
ReplyDeleteek din ubalegee bhee
tab taaqat apnee dikhalayegee
sannaate kee yehi khamoshee...
Kamlesh Mishra
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